भारतीय संस्कृति को बचाना हमारा कर्तव्य :- डाॅ नीरज त्रिपाठी

भारतीय संस्कृति को बचाना हमारा कर्तव्य
डाॅ नीरज त्रिपाठी

भारतीय संस्कृति एक निरन्तर विकासशील जीवनपद्धति रही है । आध्यात्म एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित जीवन शैली इसका मूल आधार है । भारतीय संस्कृति को संकीर्णताओं में नहीं बाँधा जा सकता। हालाँकि वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति का अर्थ बहुत ही सीमित अर्थ में देखा जा रहा है जो की भारतीय समाज के लिए अत्यंत घातक है । हमारी जीवन जीने की कला और उसमें समाहित कौशल, हमारा शिक्षण एवं ज्ञान, विज्ञान, सामाजिक संगठन, व्यापारिक तौर तरीके, उत्सव, पर्व एवं त्यौहार मनाने के अलग-अगल तरीके आदि के सम्मिलित रूप को भारतीय संस्कृति का आधार माना गया है । इसके विपरीत आज का युवा नृत्यांगनाओं के कार्यक्रम, विभिन्न शिलालेखों और विभिन्न खंडहरों की खुदाई में मिलने वाले पुरातात्विक अवशेषों को ही हमारी संस्कृति मान बैठा है । हालाँकि इन पुरातात्विक अवशेषों का हमारे इतिहास एवं संस्कृति दोनों की दृष्टि में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है और ये सभी हमारी सांस्कृतिक विरासत को प्रमाणित करते हैं । इन्हें प्रमाणिकता हेतु महत्वपूर्ण अवश्य मानना चाहिए परन्तु इन्ही को हम संस्कृति मान लें ये उचित नहीं है क्योंकि ऐसा करके ही हम अपनी वास्तविक संस्कृति से दूर होते चले गए हैं । और हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति ने हमारे विचारों को इन्ही तत्थ्यों तक सीमित कर दिया । ताकि हम भारतीय संस्कृति से दूर होते जाएँ और अंग्रेजी मानसिकता हम पर हावी हो सके , और हम पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करने की ओर अग्रसर हों । अक्सर ये देखने मिलता है की नृत्य एवं संगीत के कार्यक्रमों को सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में प्रदर्शित किया जाता है । यह सत्य है की नृत्य, संगीत तथा हास्य विनोद आदि हमारी संस्कृति के अंग हैं परन्तु संस्कृति को केवल इन कार्यक्रमों तक ही सीमित कर देना भारतीय संस्कृति की परिभाषा को अत्यंत छोटा बना देना है । हमारी संस्कृति में जहाँ एक ओर आनंद और उल्लास से भरा जीवन जीने की छूट है तो वहीँ दूसरी ओर स्वयं को पहचान कर महामानव बनने का रास्ता भी बताया गया है । जो मनुष्य को परम आनंद की अनुभूति तक ले जाने में सक्षम है । भारत देश का व्यक्ति एक ओर जहाँ ऋषि परंपरा का पालन करने वाला साधक होता था तो वहीँ दूसरी ओर अलौकिक ज्ञान प्राप्त कर युग दृष्टा एवं अनेक रहस्यों का जानकर भी । वर्तमान परिस्थितियों को देखकर ऐसा लगता है की भारतीय संस्कृति को इतिहास की तरह मात्र पढ़ने लिखने तक ही सीमित कर दिया गया है । तथा हमारे पारिवारिक एवं सामाजिक परिवेश में नैतिक मूल्यों का अकाल पड़ता जा रहा है । जिससे सांस्कृतिक मूल्य नष्ट होते चले जा रहे हैं । पीड़ा इस बात की भी है की संस्कृति के सम्बन्ध में बड़े मंचों पर अपने विचार रखने वाले बहुत से महानुभाव स्वयं अपने निजी एवं पारिवारिक जीवन में सांस्कृतिक आदर्शों का पालन करते हुए नहीं दिखाई देते जबकि समाज उनसे उच्च मूल्यों एवं आदर्शों की अपेक्षा रखता है ।अंग्रेजों के भारत में शासन करने के समय से लेकर अब तक भारतीय संस्कृति के लिए खतरा उत्पन्न करने वाली चीजों में सबसे अधिक नुकसानदेह अगर कुछ है तो वह है पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार अभियान । अंग्रेजों के शासनकाल से लेकर अभी तक की शिक्षा व्यवस्था जिस आधार पर खिसकती चली गयी उसने ही हमारी संस्कृति की जड़ों को खोखला करने का निरंतर प्रयास किया है और यह प्रयास वर्तमान में भी निर्बाध गति से चल रहा है । यह अलग बात है की पाश्चात्य विचारों की इस परंपरा के फलने फूलने में हमारी सरकारों का भी सहयोग रहा है । सरकारों ने हमारे विद्यालयों और संस्कृति संगठनों को उत्कृष्ट बनाने के प्रयास समय पर किये होते तो ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित प्रचार संगठनों और विद्यालयों के तार सम्पूर्ण देश में इतनी तेजी से न फैल पाते । ईसाई मिशनरियों द्वारा निर्बाध चलाये जा रहे प्रचार अभियान की वजह से प्रतिवर्ष हजारों भारतीय परिवार ईसाई बनते जा रहे हैं । जो की अत्यंत दुखद है । इन ईसाई संगठनों का मुख्य उद्द्येश्य भारतीय संस्कृति को नष्ट करके, भारतवासियों को नौकरी, विवाह, चिकित्सा, शिक्षा आदि के साथ-साथ धन का लालच देकर उन्हें ईसाई बनाना है । इस कार्य हेतु इन्हे विदेशों से फंडिंग मिलती है । ईसाई मिशनरियों का कार्य देश के कई राज्यों में मुख्यतया आदिवासी क्षेत्रों में अपनी पैठ जमाना है । आदिवासी भारतीय संस्कृति की परम्पराओं के मूल में रहे हैं और देश के आदिवासियों ने देश की आजादी से लेकर संस्कृति को संजोये रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है । ईसाई मिशनरियों द्वारा हमारे देश के मूल तत्व अर्थात आदिवासियों को भारतीय संस्कृति से दूर ले जाने की योजना एक सोची समझी रणनीति है । इसीलिए वे भोले भाले आदिवासी समाज को अपना निशाना बना रहे हैं । एक ओर जहाँ हमारी भारतीय संस्कृति को ईसाईयत से खतरा बना हुआ है वहीँ दूसरी ओर हमारे समाजद्वारा पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण का कार्य आने वाले कई खतरों का आगाज है । हम भारतवासी अपने रहन सहन और नित्य जीवन प्रणाली के साथ विचारों की प्रेरणा भी अगर पश्चिम से लेने लगेंगे तो भारतीय संस्कृति का पतन होना निश्चित है । इसी अंधानुकरण में हम सब अपनी संस्कृति को भूलने लगे हैं तथ्यों से दूर जाने लगे हैं । हमारे समाज में अपने त्योहारों की प्रति प्राचीन समय जैसा उत्साह देखने को नहीं मिलता है । जबकि बहुत से पश्चिमी त्योहारों को सभी लोग बहुत उत्साह से मानते हैं । हमारे विद्यालयों में पहले दीपावली, दशहरा आदि त्योहारों पर विद्यार्थियों को लम्बी छुट्टी मिलती थी जबकि वर्तमान में यह छुट्टी क्रिसमस जैसे त्योहारों पर मिलने लगी है । सरकारों के समर्थन से लागू होने वाले ऐसे आदेशों का हम देशवासियों ने कभी विरोध नहीं किया क्योंकि हम केवल हमें मिलने वाली छुट्टी से खुश हैं । हम यह सोचने की शक्ति खोते जा रहे हैं की यह हमारी संस्कृति पर आघात है । सांस्कृतिक तथ्यों, प्रेरणाओं और परम्पराओं को भूलकर पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण हमारी संस्कृति की लिए बहुत बड़ा खतरा बन रहा है । और इससे हम अपनी संस्कृति की जड़ें कमजोर करते जा रहे हैं । हमें यह याद रखना होगा की जिन परम्पराओं को स्थापित करने और गुलामी की लम्बी दासता के बाद भी उन्हें संजोये रखने के लिए हमारे ही पूर्वजों ने बलिदान दिए हैं उन्हें बचाये रखने की जिम्मेदारी हमारी ही है । पश्चिमी देशों ने जहाँ एक ओर अपनी संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए भारत जैसे अन्य देशों में पैसे बहाये हैं वहीँ दूसरी ओर हमने अपनी भारतीय संस्कृति के प्रति पूरी निष्ठा भी नहीं बरती है । भारतीय संस्कृति जिसने सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान का प्रकाश दिया, विश्व की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत दी, वेद, पुराण, उपनिषद दिए, आयुर्वेद दिया उसके प्रति अगर हमने सच्ची निष्ठा से समर्पण दिखाया होता तो शायद आज विश्व की तस्वीर अलग होती । हमने अपनी इन धरोहरों पर गर्व करना छोड़ दिया । अन्यथा हमारे प्रयासों से दुनिया के लोग आपस में जुड़ते और विघटन के स्थान पर हम सभी को एक सूत्र में पिरो देते । सम्पूर्ण जगत में भारतीय संस्कति को मानने वालों की संख्या सर्वाधिक होती । जिसके प्रभाव से आपस में प्रेम और भाईचारा बढ़ता । वर्तमान समय की आवश्यकता है की सामाजिक विघटन के जिस राह पर विश्व चल रहा है उससे पार पाने हेतु हम सब भारतीय संस्कृति के प्रति गर्व अनुभव करें । संस्कृति के आदर्शों को माने और उनका पालन करें । अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रति सजग हों तथा पश्चिमी अंधानुकरण से बचते हुए अपने आने वाले भविष्य को उत्कृष्ट बनाने के प्रयास करें । इन्ही प्रयासों से हम भारतीय संस्कृति को नष्ट होने से बचा पाएंगे और राष्ट्र को पुनः सबल बना पाएंगे