चितरंगी विधानसभा : सत्ता, संवेदना और समकालीन राजनीति
चितरंगी विधानसभा की राजनीति इन दिनों किसी शांत सरोवर की तरह नहीं, बल्कि उस नदी की भाँति प्रवाहित हो रही है जिसमें सतह पर लहरें भी हैं और भीतर गहराई भी। मध्य प्रदेश सरकार में चितरंगी के वर्तमान नेतृत्व के हालिया वक्तव्यों ने उनकी राजनीतिक परिपक्वता और संवेदनशीलता को लेकर कई प्रश्न खड़े किए हैं।
आज की राजनीति में शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं रहे, वे हथियार बन चुके हैं। और जब शब्दों के साथ व्यवहार भी उसी धार में बहने लगे, तब उसका प्रभाव व्यक्ति विशेष से आगे बढ़कर संगठन और विचारधारा तक पहुँचता है। एक गरिमामय पद पर आसीन जनप्रतिनिधि से अपेक्षा होती है कि वह अपने आचरण और संवाद—दोनों में संतुलन बनाए रखे।
भारतीय जनता पार्टी में कोई भी निर्णय आकस्मिक नहीं होता। हर राजनीतिक उभार के पीछे संगठन की गहन समीक्षा, जमीनी कार्यकर्ताओं का फीडबैक और वर्षों की निष्ठा शामिल होती है। भाजपा का आधारभूत कार्यकर्ता कभी लालच या पद से संचालित नहीं होता, वह राष्ट्र और विचार के हित में निष्पक्ष सूचना संगठन तक पहुँचाता है। यही कारण है कि किसी नेता का राजनीतिक भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह कार्यकर्ताओं के विश्वास पर कितना खरा उतरता है।
चितरंगी में भाजपा की नींव जिन संघर्षों से पड़ी, उनमें पूर्व मंत्री एवं पूर्व विधायक माननीय जगन्नाथ सिंह की भूमिका ऐतिहासिक रही है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को केवल निर्देश नहीं दिए, बल्कि उन्हें सम्मान और सहभागिता दी। यही कारण था कि अभावों के बावजूद कार्यकर्ता संगठन से जुड़े रहे। आज वही कार्यकर्ता यह प्रश्न पूछने को विवश हैं कि क्या उन्हें वही सम्मान और संवाद वर्तमान नेतृत्व से मिल पा रहा है।
इसी संदर्भ में माननीय जगन्नाथ सिंह की राजनीतिक छवि स्मरण हो आती है और अनायास ये पंक्तियाँ मन में गूंजती हैं—
“हमारे ऐब मत देखो, हमारी नीयत को परख लेना,
हमारे किरदार में खुशबू-ए-रातरानी साथ चलती है।”
जनता ने पूर्व मंत्री के किरदार को स्वीकार किया, जबकि तुलनात्मक रूप से वर्तमान नेतृत्व आलोचनाओं और शिकायतों के घेरे में दिखाई देता है। संगठनात्मक चर्चाओं से यह संकेत भी मिलते हैं कि चितरंगी को लेकर शीर्ष नेतृत्व तक पहुँच रहा फीडबैक अत्यधिक सकारात्मक नहीं है।
वर्तमान नेतृत्व की राजनीतिक यात्रा किसी आकस्मिक संयोग की देन नहीं है। यह माननीय जगन्नाथ सिंह और माननीय अमर सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं के संघर्षों से उपजी राजनीतिक विरासत का विस्तार है। यह विरासत केवल नाम या पद की नहीं, बल्कि संगठन, संस्कार और उत्तरदायित्व की भी है। कार्यकर्ताओं ने समय-समय पर नेतृत्व को स्वीकार किया, किंतु यह विश्वास तभी स्थायी रह सकता है जब नेतृत्व संगठनात्मक अनुशासन और कार्यकर्ता-सम्मान के साथ चले।
चितरंगी के कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर विधानसभा क्षेत्र के बाहर से विधायक प्रतिनिधि नियुक्त करना यह प्रश्न खड़ा करता है कि क्या चितरंगी में कोई योग्य भाजपा कार्यकर्ता नहीं था। या जिन कार्यकर्ताओं ने चुनाव जितवाया उनपर भरोसा नहीं है? राजनीतिक विरासत जितनी बड़ी होती है, उतनी ही सावधानी भी माँगती है। इसी संदर्भ में यह पंक्तियाँ आत्मचिंतन का आग्रह करती हैं—
“कहीं बोलो तो ज़रा ठहरो, थोड़ा संभलो,
मिली जो पुरखों से विरासत, खानदानी साथ चलती है।”
यह निर्विवाद है कि चितरंगी विधानसभा में भाजपा की स्थिति मजबूत है, किंतु लोकतंत्र में नेताओं का आत्मसंतोष सबसे बड़ा खतरा होता है। जनता का मन कब, किस बात से प्रभावित हो जाए—यह राजनीति की सबसे अनिश्चित सच्चाई है। नेतृत्व का दायित्व केवल उपलब्धियों तक सीमित नहीं, बल्कि असंतोष की जड़ों तक पहुँचने और संवाद स्थापित करने में निहित होता है।
प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में चलाए गए सदस्यता अभियान के दौरान कांग्रेस पृष्ठभूमि से आए लोगों का भाजपा में स्वागत समकालीन राजनीति की स्वाभाविक प्रक्रिया है। किंतु विचारधारा कोई वस्त्र नहीं होती जिसे तुरंत बदला जा सके। आरंभ में दिल कांग्रेसी ही रहता है—कांग्रेस के लिए वर्षों तक वोट माँगने के बाद भाजपा के लिए वोट माँगना दल बदलने वालों के लिए कितना कठिन होता है, यह उनसे पूछा जा सकता है। ऐसे में वर्षों से संगठन की नींव बने अनुभवी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर नए आए लोगों को प्राथमिकता देना अपरिपक्व राजनीतिक दृष्टिकोण का परिचायक बन सकता है।
दल बदलने वालों में वैचारिक प्रतिबद्धता समय, संवाद और संगठनात्मक संस्कारों से ही विकसित होती है।
निष्कर्षतः, चितरंगी की राजनीति आज आत्ममंथन की माँग कर रही है। सत्ता तभी स्थायी बनती है, जब वह संवेदना, संवाद और संगठनात्मक मर्यादा के साथ चले।
डॉ. विनीत तिवारी
राजनीतिक विश्लेषक एवं
सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर, उत्तर प्रदेश
नगर अध्यक्ष, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद
(लेखक के कई लेख राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित)