दो दिवसीय ‘इंडिया फार्मा 2026’ फार्मास्युटिकल नवाचार को बढ़ावा देने के लिए बेहतर वित्तपोषण, बुनियादी ढांचे और गति ले मजबूत आह्वान के साथ सम्पन्न हुआ
दूसरे दिन की चर्चा रणनीतिक निवेश और भविष्योन्मुखी विचार पर केंद्रित रही
800 से अधिक प्रतिनिधियों और 60 राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वक्ताओं ने 10 सत्रों में भाग लिया
भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषधि विभाग द्वारा एफआईसीआई और आईपीए, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित इंडिया फार्मा 2026 का 9वां संस्करण, भारत के फार्मास्युटिकल और बायोफार्मा पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के उद्देश्य से दो दिनों के व्यापक विचार-विमर्श के बाद आज सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

कार्यक्रम के दूसरे दिन, दो पूर्ण सत्र और एक समापन सत्र आयोजित किए गए, जिनका मुख्य उद्देश्य फार्मास्युटिकल वित्तपोषण प्रणाली को मजबूत करना और नवाचार-आधारित विकास के लिए भविष्योन्मुखी मार्ग प्रशस्त करना था। इन चर्चाओं में उद्योग, वित्त, शिक्षा और नीति जगत के प्रमुख हितधारक एक साथ आए और उन्होंने क्षेत्रीय परिवर्तन के अगले चरण को गति देने में रणनीतिक निवेश, बुनियादी ढांचे और गति के महत्व पर प्रकाश डाला। सत्रों में व्यापक स्तर से अभूतपूर्व नवाचार की ओर बदलाव पर बल दिया गया, जिसमें उन्नत चिकित्सा पद्धतियों पर विशेष ध्यान दिया गया और निवेश एवं नवाचार के तालमेल के माध्यम से विकास के नए क्षेत्रों को खोलने पर बल दिया गया।
इस कार्यक्रम में दोनों दिन 800 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिसमें 60 से अधिक वक्ताओं ने 10 सत्रों में, जिनमें 6 पूर्ण सत्र, और 20 से अधिक सहयोगी संगठनों द्वारा समर्थित सत्र शामिल थे, में भाग लिया।
समापन भाषण देते हुए, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषधि विभाग के संयुक्त सचिव श्री सत्यप्रकाश टीएल ने कहा कि विभिन्न सत्रों में हुई चर्चाओं का मुख्य बिंदु विकास के अगले चरण के लिए तीन महत्वपूर्ण कारक: वित्तपोषण, अवसंरचना और गति थे। यद्यपि हितधारकों ने प्राथमिकताओं पर अलग-अलग विचार व्यक्त किए, फिर भी इस बात पर सहमति बनी कि सरकार, उद्योग और शिक्षा जगत के बीच समन्वित कार्रवाई आवश्यक है। सहयोग की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए भारत को बदलते वैश्विक औषधि परिदृश्य में सक्रिय रूप से अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी।

दिन के आरंभिक सत्रों में दो पूर्ण सत्र आयोजित किए गए। “एक जीवंत फार्मा वित्तपोषण पारिस्थितिकी तंत्र का विकास” विषय पर आयोजित सत्र में फार्मास्युटिकल नवाचार को गति देने में समयोचित और रणनीतिक पूंजी की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया गया। वक्ताओं ने इस बात पर प्रकाश डाला कि इस क्षेत्र में सतत विकास न केवल वैज्ञानिक प्रगति पर बल्कि विविध और सुलभ वित्तपोषण तंत्रों की उपलब्धता पर भी निर्भर करता है। अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. शिवकुमार कल्याणरमन ने विकसित हो रही अनुसंधान वित्तपोषण संरचना की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि इसमें अकादमिक और गैर-लाभकारी संस्थानों के लिए अनुदान-आधारित सहायता के साथ-साथ निजी क्षेत्र के लिए पूंजी-आधारित साधन भी शामिल हैं।
इस चर्चा में वेंचर कैपिटल, प्राइवेट इक्विटी, ब्लेंडेड फाइनेंस और सार्वजनिक-निजी भागीदारी जैसे वित्तपोषण के विभिन्न माध्यमों पर विचार-विमर्श किया गया, जो दवा कंपनियों के लिए विकास के नए रास्ते खोल रहे हैं। उद्योग, निवेशकों, नियामकों और अनुसंधान संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग को बढ़ावा देने पर बल दिया गया ताकि एक लचीला और प्रभावी वित्तपोषण तंत्र विकसित किया जा सके। पैनलिस्टों ने इस क्षेत्र के सामने आने वाली प्रमुख वित्तीय चुनौतियों पर भी चर्चा की, जिनमें लंबे अनुसंधान एवं विकास चक्र, उच्च जोखिम वाले निवेश और नियामक एवं बाजार संबंधी अनिश्चितताएं शामिल हैं। प्रारंभिक चरण के अनुसंधान से लेकर व्यावसायीकरण तक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला का समर्थन करने वाले नवीन वित्तपोषण मॉडलों की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया, जो नवाचार को गति देने और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के लिए आवश्यक है।

छठे पूर्ण सत्र का संचालन भारतीय फार्मास्युटिकल एलायंस के महासचिव श्री सुदर्शन जैन ने किया । इस सत्र का मुख्य उद्देश्य क्रमिक प्रगति से आगे बढ़कर साहसिक और नवाचार-आधारित परिवर्तन की दिशा में भारत के फार्मास्युटिकल विकास के अगले चरण की रूपरेखा तैयार करना था। भारत के जैव प्रौद्योगिकी और फार्मास्युटिकल पारिस्थितिकी तंत्र के व्यापक विकास पर प्रकाश डालते हुए, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की पूर्व सचिव डॉ. रेणु स्वरूप ने ‘नवाचार में ऊंची कूद के लिए विचार और बड़े कदम’ विषय पर सत्र को संबोधित करते हुए इस बात पर बल दिया कि देश ने पिछले एक दशक में खोज, विकास और तैनाती तक फैली एक व्यापक नवाचार मूल्य श्रृंखला के निर्माण में महत्वपूर्ण प्रगति की है। भारत ने अकादमिक जगत और उद्योग के बीच बिखरे हुए संबंधों को सफलतापूर्वक मजबूत किया है और उत्पाद विकास के लिए एक अधिक सुसंगत पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किया है। कोविड-19 महामारी के अनुभव का हवाला देते हुए, उन्होंने इसे एक परीक्षण मंच बताया जिसने वित्तपोषण, साझेदारी, बुनियादी ढांचे और त्वरित नवाचार जैसे क्षेत्रों में भारत की क्षमताओं को प्रमाणित किया।
सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड के कार्यकारी अध्यक्ष श्री दिलीप संघवी ने इस बात पर जोर दिया कि फार्मास्युटिकल नवाचार में स्वाभाविक रूप से उच्च जोखिम होता है और इसके लिए हितधारकों के बीच जोखिम साझा करने के तंत्र की आवश्यकता होती है। उन्होंने अनुसंधान एवं विकास में निरंतर निवेश, प्रतिपूर्ति प्रक्रियाओं के महत्व और नवीन भारतीय उत्पादों की एक मजबूत श्रृंखला के निर्माण पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत ने जेनेरिक दवाओं और टीकों के क्षेत्र में वैश्विक नेता के रूप में खुद को स्थापित किया है, लेकिन अगला चरण नवीन दवाओं और अत्याधुनिक विज्ञान को आगे बढ़ाकर वैश्विक स्वास्थ्य सेवा के भविष्य को आकार देना है। ज़ाइडस लाइफसाइंसेज के अध्यक्ष श्री पंकज पटेल ने अनुसंधान के लिए मजबूत वित्तीय सहायता और नई दवाओं के लिए बाजार पहुंच बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
एफआईसीसी फार्मा कमेटी के सह-अध्यक्ष और एली लिली इंडिया के अध्यक्ष और महाप्रबंधक श्री विंसलो टकर ने इस बात पर प्रकाश डाला कि फार्मास्युटिकल क्षेत्र में सफल परिवर्तन के लिए एक स्पष्ट रणनीतिक इरादे की आवश्यकता होती है, जिसे अच्छी तरह से परिभाषित लक्ष्यों के साथ एक चरणबद्ध रोडमैप द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए।
उद्योग जगत के नेताओं ने सरकार, शिक्षा जगत और उद्योग के बीच गहरे सहयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया, साथ ही एआई की परिवर्तनकारी भूमिका और सभी हितधारकों के बीच जवाबदेही के महत्व को भी रेखांकित किया।
इन सत्रों में सामूहिक रूप से इस बात पर प्रकाश डाला गया कि यद्यपि भारत ने फार्मास्यूटिकल्स में मजबूत नींव रखी है, लेकिन विकास के अगले चरण में साहसिक निवेश, गहन पारिस्थितिकी तंत्र सहयोग और नवाचार-आधारित विकास की ओर बदलाव की आवश्यकता होगी ताकि देश को उन्नत चिकित्सा पद्धतियों में वैश्विक नेता के रूप में स्थापित किया जा सके।