SC-ST वर्ग से महामंडलेश्वर बनाने को लेकर बवाल

गुजरात और महाराष्ट्र में एससी और एसटी वर्ग के महामंडलेश्वर बनाने को लेकर बवाल खड़ा हो गया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की समरसता की पहल का अखिल भारतीय पुजारी महासंघ ने विरोध किया है। अखिल भारतीय अखाडा परिषद ने एससी और एसटी वर्ग से महामंडलेश्वर बनाने का प्रकल्प हाथ में लिया है। गुजरात में पिछले हफ्ते इसकी शुरुआत की गई। महाराष्ट्र में भी जल्द ही इन वर्गों के महामंडलेश्वर बनाए जाएंगे। इसका अखिल भारतीय पुजारी महासंघ ने विरोध किया है। महासंघ के अध्यक्ष महेश पुजारी ने अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रवींद्र पुरी जी महाराज को पत्र लिखकर कहा है कि यदि संतों को राजनीति करनी है तो अपने भगवा चोले को त्याग देना चाहिए।

अखिल भारतीय पुजारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेश पुजारी ने अखाड़ा परिषद अध्यक्ष रवीन्द्र पुरी जी महाराज को पत्र लिखा है। उन्होंने लिखा कि अखाड़ा परिषद एससी और एसटी वर्ग से 100 साधुओं को महामंडलेश्वर बनाएगा। इसकी बड़ी प्रसन्नता हुई लेकिन मन में चिंता और दुख भी हुआ कि यदि साधुओं में भी एससी, एसटी और दलित के नाम का जातिवाद होने लगेगा तो देश में साधु-संतों का जो मान सम्मान है, वह कम होगा। जब किसी भी वर्ग का व्यक्ति साधु बनता है तो वह अपना स्वयं का पिंडदान कर देता है। वह अपने परिवार और समाज के लिए मर चुका होता हैं। उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता हैं। उसकी कोई जाति या वर्ण नहीं होता। उसके लिए सभी समान होते हैं तो फिर साधुओं में एससी एसटी और दलित क्यों?

महेश पुजारी ने अखाड़ा परिषद अध्यक्ष से यह भी जानना चाहा कि क्या अखाड़ों में इस वर्ग के लोग नहीं हैं? इसका पता लगाना चाहिए। अखाड़ों के जितने भी महामंडलेश्वर है उनकी जातिगत आधार पर सूची हिंदू समाज के सामने प्रस्तुत करना चाहिए। इससे हिन्दू समाज को आपके द्वारा किए जा रहे सामाजिक उत्थान के कार्य में संशय नहीं रहेगा। वर्तमान में उज्जैन के एक सम्माननीय संत को भारत सरकार ने राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया हैं। वह वाल्मीकि समुदाय से आते हैं। ऐसा भी पता चला है कि चारधाम मंदिर के महामंडलेश्वर प्रजापत कुम्हार समाज से आते हैं। ऐसे और भी कई संत है जो सभी समाजों से आते हैं। संत समुदाय में तो पहले से ही समरसता हैं तो आज जातिवाद का नया बीजारोपण क्यों? यह सनातन धर्म संस्कृति के लिए घातक है। अखाड़ा परिषद जिन्हें भी महामंडलेश्वर बनाएगा, तो क्या उनके नाम के आगे उपनाम में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, एससी, एसटी या दलित लिखेंगे? यदि 100 महामंडलेश्वर नियुक्त होने के बाद आपसे अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पद की मांग की जाती है तो क्या सामाजिक समरसता और समभाव के लिए आप अपने अध्यक्ष पद का त्याग करेंगे? यह सनातन धर्म को मानने वाले अनुयायियों को स्पष्ट करें। साधु-संतों में एससी, एसटी और दलित और अन्य समुदाय का जातीय वर्गीकरण कर उनका अपमान न करें।

धर्म में नहीं होनी चाहिए राजनीति 
महेश पुजारी ने लिखा कि राजनीति में धर्म होता है लेकिन धर्म में राजनीति नहीं होनी चाहिए। यदि संतों को राजनीति करनी है तो अपना भगवा चोले का त्याग करना चाहिए। वर्तमान में संतों को जैन समाज के संतो से धर्म की पारायणता सीखने की बहुत आवश्यकता हैं। जैन संत कभी भी किसी वर्ग या राजनीति की बात नहीं करते हैं। वह केवल अपने जैनत्व को आगे बढ़ाने की बात करते हैं। आदि शंकराचार्य ने देश में धर्म, संस्कृति, सभ्यता और परंपरा का ज्ञान दिया। इसमें किसी प्रकार के सामाजिक बंधन, छुआछूत या भेदभाव नहीं किया गया। पिछले कई दशकों से सनातन धर्म को मानने वाले अनुयायियों ने भी किसी साधु-संत से उसकी जाति नहीं पूछी। केवल उनके ज्ञान को माना है तो फिर आज साधु-संतों में एससी, एसटी और दलित साधुओं के नाम पर राजनीति कर उनके मान-सम्मान को ठेस क्यों पहुंचाई जा रही है?

Published by:  अमर उजाला, उज्जैन